रामदेव जी जब छोटे थे तब पोकरण गाँव के आस-पास भैरव नामक राक्षस का बड़ा आतंक था । कहते हैं वह जहाँ रहता था उसके चौबीस मील तक आस-पास में कोई भी मानव या जानवर नहीं रहते थे । विशालकाय वह राक्षस सारी जनता के लिए एक चिंता का विषय था ।
कई लोग उस राक्षस के कारण अपना घर छोड़कर भाग गये थे ।
पूरी प्रजा के साथ-साथ राजा अजमाल जी खुद भी उस राक्षस से परेशान थे । एक दिन वे अपने महल में उस भैरव राक्षस के आतंक के सम्बन्ध में ही बात कर रहे थे की बालक रामदेव वहां आ गये और उन्होंने वह बात सुन ली । उन्होंने भैरव को मार कर धरती से पाप का भार मिटाने की ठानी ।
अगले दिन सुबह ही वे अपने मित्रों के साथ गेंद खेलने के लिए घर से बाहर गये । खेलते-खेलते वे बालीनाथजी की कुटिया पहुँच गये, जहाँ पर भैरव राक्षस का अक्सर आना जाना था । रामदेव को अपने यहाँ देख बालिनाथजी घबरा गये और भैरव राक्षस से बचने हेतु एक गूदड़ी (कंबल) में छिपने को कहा ।
भैरव राक्षस ने आते ही मनुष्य की गंध को पहचान ली और उस गूदड़ी को खीचने लगा, लेकिन वह गूदड़ी द्रोपदी के चीर की तरह बढती ही जाने ही लगी यह देख भैरव मन में घबराया और वहा से भाग उठा । उस राक्षस के पीछे रामदेवजी भागने लगे और उस राक्षस को पकड़ कर उस पापी का अंत कर दिया तथा एक गुफा में धकेल दिया ।
4. मिश्री को नमक बनाया
एक समय की बात है नगर में एक लाखु नामक "बणजारा" जाति का व्यापारी अपनी बैलगाड़ी पर मिश्री बेचने हेतु आया । उसने अपने व्यापार से सम्बंधित तत्कालीन चुंगी कर नहीं चुकाया था । रामदेवजी ने जब उस बणजारे से चुंगी कर न चुकाने का कारण पूछा
तो उसने बात को यह कह कर टाल दिया कि यह तो नमक है, और नमक पर कोई चुंगी कर नहीं लगता और अपना व्यापार करने लगा यह देख कर रामदेव जी ने उस बणजारे को सबक सिखाने हेतु उसकी सारी मिश्री नमक में बदल दी।
थोड़ी देर बाद जब सभी लोग उसको मिश्री के नाम पर नमक देने के कारण पीट रहे थे तब उसने रामदेवजी को याद करते हुए माफ़ी मांगी और चुंगी कर चुकाने का वचन दिया ।
रामदेवजी शीघ्र ही वहां पहुंचे और सभी लोगो को शांत करवाते हुए कहा कि इसको अपनी गलती का पश्चाताप है, अतः इसे मैं माफ़ करता हूँ, और फिर से वह सारा नमक मिश्री में बदल गया ।