परचा गैलेरी :
 
 
23. रूपादे व रावल मालजी को परचा

रावल मालजी मारवाड़ के शासक थे, महवे नगर में इनकी राजधानी थी । इनकी रानी रूपादे रामदेव जी की अनन्य भक्त थी, और माल जी रामदेव जी की भक्ति को मात्र आडम्बर समझते थे और हमेशा ही रानी की बाबा के प्रति श्रद्धा का विरोध करते थे ।

 

एक समय उस नगर में किसी मेघवाल जाति के घर में बाबा के जम्मे का आयोजन था । रानी रूपादे ने मालजी से जम्मे में जाने की अनुमति मांगी, परन्तु मालजी ने उन्हें जाति-धर्म की कुरीतियों के कारण उस जम्मे में जाने से सक्त मना कर दिया और रूपादे को एक कमरे में बंद कर दिया ।

 

रूपादे बाबा का मन ही मन में स्मरण करने लगी, तभी बाबा के चमत्कार से उस कमरे के ताले स्वतः ही खुल गये एवं सभी सिपाही मूर्छित हो गये । रानी मौका पाकर उस मेघवाल के घर पहुँच गयी जहाँ पर जम्मा हो रहा था । सभी ने रूपादे का बहुत सत्कार किया । परन्तु वहां पर मालजी का एक गुप्तचर भी उपस्थित था, उसने रानी रूपादे कि चुगली राजा से करने की सोची और साक्ष्य के रूप में रानी की मोजडी उठा के महल की तरफ गया । महल पहुंचते ही वह ज्योंही राजा को वह मोजडी दिखाने लगा तो उसके सम्पूर्ण शरीर में छाले हो गये और वह अन्धा हो गया, तभी रूपादे वहां पर पहुंची, रानी को उस गुप्तचर पर दया आ गयी और उसने बाबा से उसकी भूल पर स्वयं क्षमा मांगी एवं उसे पुनः स्वस्थ करने की प्रार्थना करने लगी ।

 

देखते ही देखते वह गुप्तचर बाबा के चमत्कार से पुनः स्वस्थ हो गया और अपनी गलती के लियी रानी रूपादे से क्षमा माँगने लगा । यह सब देख रावल मालजी के आँखों पर बंधी आडम्बर की पट्टी खुल गयी, और वे बाबा कि लीला के आगे नतमस्तक होकर बाबा का जयगान करने लगे । यही रावल मालजी आगे उगमसी भाटी से दिक्षा प्राप्त करके मल्लीनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुए ।

 

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